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                लाल रंग

हाँ आज मैं बेशर्मी से यह किस्सा तुम्हे सुनाती हूँ

लाल बिंदि ,लाल चूडी़,लाल फूल,से खुद को सजाती हूँ।

कहो जब उस एक लाल रंग को अपवित्र,तो शरम से झुक जाती हूँ।

फिर भी हिम्मत से आज मैं अपनी दस्ता  बतलाती हूँ।

हाँ,उस लाल रंग से ही तो जीवन का आधार है।।

छुपाअों ना तुम बात ये बहुत आम है।

हर महिने नारी मे आती वो लाल शाम है।

शरमाने की बात नहीं कुदरत का ये पैगाम है।

धीरे से कहते हो जिसको तुम मासिक धर्म उसका नाम है।

हाँ उस लाल रंग से ही तो जीवन का आधार है।।

काली पननी में ले जाती,देखों वो  क्या सामान है।

लज्जित हुई कयों छुपा रही अपनी पहचान ,

कया हो रहा उसका अपमान है?

 

इस रक्त के लाल रंग से ही इंसान जिन्दा है।

तो फिर नारी धर्म के लाल से कयों 

शर्मिंदा है?

बताओ ! कया ये रंग इतना गंदा है ,सच मे यह रंग इतना गंदा है ?

 

लाल रंग से अचानक भीड़ में उसकी मुलकात हुई ,

कलास मे थेडी गीली पाकर ,खुद को वो महसूस हुई ,

उत्तर देने के लिए ,खडे़ होने से जब वह कतरा रही,

सभी को लगा ,आज फिर कोई बहाना बना रही।

काम की छेडो़,स्कूल से भी ना छट्टी कभी इसकी मिलती है,

छोटी उमर मे हर बिटिया उस दर्द को बैठे सिलाती है

देखो ,हर विषय में हर छेत्र मे फिर कैैसे वो खिलती है,

खुशबु जिसकी हमे कई वषों से मिलती है

उस रंग का ना तुम अपमान करो ,हर नारी का तुम सम्मान करो।।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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