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नाम का इश्क़ नहीं होता मुझसे
इबादत की तरह वफ़ा करता हूँ मैं
कोई ग़र कहे कुछ बारे में तेरे तो
सबसे पहले तुझसे पूछा करता हूँ मैं
तुझे ना हो मुझ पर यक़ीन तो क्या
ख़ुद से ज्यादा तुझपे करता हूँ मैं
कोई पूछे ग़र तेरे बारे में मुझसे तो
कह देता हूँ कि तुझपे मरता हूँ मैं
तेरे लिए मैं आज भी वही आवारा हूँ
मग़र जिम्मेदारियों को अब समझता हूँ मैं
नामंजूरियाँ अब मुझे खफ़ा नहीं करती
तेरे हर फ़ैसले का स्वागत करता हूँ मैं ।

 

 

 

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