2 मिनट की मुलाक़ात

परिवर्तन प्रकृति का स्वभाव है। चाहे वो जलवायु में हो, जीवों में हो या चीज़ों में। बदलते वक़्त के साथ इंसान का प्रेम और प्रेम करने का तरीक़ा दोनों में आश्चर्यजनक परिवर्तन हुआ है। एक समय था प्रेम आदर्शवादी हुआ करता था, अब प्रेम ही भाषा बदल गई है। इस मुख्य कारण सिनेमा का प्रभाव भी है, लोग जो मूवी में देख कर आते हैं और वैसा ही करने का प्रयास करते हैं। नश काट लेना, जान ले लेना, लड़की के मना करने पर एसिड फेंक देना इत्यादि। बहरहाल मेरा उद्देश्य वर्तमान प्रेम के फ़ायदे और नुक़सान गिनाने का नहीं है। मेरे हिसाब से प्रेम जीवन देता है, लेता नहीं। मेरा अनुमान गलत भी हो सकता, पर मेरा विवेक यही कहता है। मगर पूरी दुनिया ऐसा ही कर रही है, ये कहना भी ग़लत होगा। कहीं कहीं आदर्शवादी प्रेम बचा भी है। कुछ कहानी ऐसी भी होती है, जिसे जान कर करुणा, क्रोध और बेचैनी समांतर रूप से उत्पन्न होते हैं। वसीम बरेलवी साहब का शे’र है “वो दिन गए जो मुहब्बत थी जान की बाजी, किसी से अब कोई बिछड़े तो मर नहीं जाता”। बात शत प्रतिशत सही है, पर वास्तविक बात ये है कि आदर्शवादी प्रेम बिछड़ने के बाद जीने भी नहीं देता, मगर जीना पड़ता है, आख़िर पहला प्यार माता पिता जो होते हैं, ज़िन्दगी उन्हीं की दी हुई है।
प्रेम तक पहुंचना सोशल मीडिया ऐप व साइट में आसान बना दिया है, वहीं छोटे शहरों में ये इतना ही मुश्किल है।
एक बड़ी सी प्रेम कहानी का छोटा सा प्रसंग मैं साझा करता हूं। लड़का और लड़की छोटे से शहर के निवासी है, शहर क्या कस्बा कहना ठीक होगा, इतना छोटा की शहर का हर इंसान एक दूसरे से कहीं न कहीं परिचित है। जितना आसान मुहब्बत को फिल्मों में दिखाया जाता है, वास्तविकता में वो उतना ही जटिल है। बाधाओं के रूप में समाज, लोग, जाति, धर्म, रोज़गार तटस्थ खड़े रहते हैं। इन सब से छुपकर प्रेम करना भी बहुत हिम्मत की बात है। लड़के और लड़की में प्रचुर प्रेम है, पर एक दूसरे को कभी बोला नहीं, क्यूंकि दोनों इतने परिपक्व तो हो ही चले हैं कि वे जानते हैं बात बढ़ाने के बाद बाधाओं से लड़ पाना शायद उनके बस में नहीं। लड़ता अपने अस्तित्व के लिए जूझ ही रहा है, और ख़ैर छोटे शहरों में तो लड़कियों का अपना अस्तित्व ही नहीं होता, उसके लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ता है। कोई भी सरकारी परीक्षा देने के लिए दूसरे शहर जाना पड़ता था, क्यूंकि उस छोटे में शहर सरकार सेंटर नहीं देता था। अब ये अवरोध लड़की लड़के के लिए वरदान था। लड़की के लिए वाले कुछ ज्यादा ही शख्त थे, तो ग्रेजुएशन होने के बाद उसका निकलना भी बंद कर ही दिए, तो किसी से मिलना तो दूर की बात। लड़की और लड़के की मुलाकात ग्रेजुएशन के दौरान ही हुई थी, उसी दौरान नज़दीकियां भी बढ़ी। पर अब स्थिति ये है कि एक दूसरे के रूबरू होना भी असम्भव सा प्रतीत होता है। स्थिति ये तक हो चली है कि एक दूसरे को कुछ मिनट मन भर देखने भर के लिए ही वो एग्जाम फॉर्म एक साथ डालते थे। एडमिट कार्ड आने तक लड़की हर सोमवार इसलिए बस उपवास करती और लड़का हर मंगलवार इसलिए बस मंदिर जाता कि उनकी चीर तपस्या का फल भगवान उनको एक ही सेंटर के रूप में दे। और भगवान ने उनकी सुनी भी।
दूसरे शहर जाने वाले एकमात्र लोकल में लड़का अपने मित्र के साथ जाकर किसी बोगी में जगह ढूंढ कर पसर गया। चूंकि दोनों के बीच संप्रेषण का साधन लड़की के अपने मां के “कीपैड”
वाले फोन से मैसेज करना बस था, तो लड़का बस इतना ही जान पाया था कि लड़की घर से निकल चुकी है, वो भी अक्सर अन्य किसी प्रेम कहानी के खलनायक जो लड़की का भाई ही होता है उसके साथ। लड़का अपने मित्र के साथ बेख़याली में डूबा है था कि इत्तिफाक देखिए, लड़की भी अपने भाई के साथ उसी बोगी में चढ़ी। अब सोचिए, कितना मुश्किल होता है न एक दूसरे को इतना अच्छे से जानते हुए भी अनजान बने रहने का अभिनय करना। कैसे एक दूसरे को छुप छुप के देखने में २ घंटे का सफ़र खत्म हुआ पता ही नहीं चला। आप अंदाज़ा लगाते रहीए, पर ये सच है, एक दूसरे को बस कुछ देर देखने भर के लिए ये सब हो रहा है। एग्जाम के दिए गए समय से पहले ही लड़का सेंटर पहुंच गया, कि कहीं लड़की दिख जाए, पर शायद लड़की ने कुछ कारणवश देरी कि तो अपने अपने रूम जाके दोनों को बैठना पड़ा। लड़का बस ये सोचता रहा, कहीं इस रूम का एग्जामिनर अगर देर से जाने दिया तो वो लड़की से मिल नहीं पाएगा, इसी बेचैनी में उसने परीक्षा पूरी की। पूरे सेंटर में सबसे पहले लड़के का क्लास छूटा, एक एक करके सब क्लास छूट रहे थे और लोग जाते जा रहे थे, लड़का सोचा कहीं लड़की उसकी नज़र से ओझल तो नहीं हो गई, वो रह रह के नज़र घुमा रहा था। लड़की का क्लास सबसे लेट में छूटा, आख़िर में लड़की दिख है गई, दोनों के चेहरे में एक मुस्कान थी, वहीं पुरानी मुस्कान, जो हमेशा एक दूसरे से मिलने में हुई। लड़की ने लड़के के पसंद का पीला ड्रेस पहना था, लड़की के पास आते ही पहला सवाल था “कैसी हो!” लड़की सारे परेशानियों को अपने मुस्कुराहट में समेटकर बोली ,” जैसी भी थी, पर अब आपको देख कर अच्छा महसूस कर रही हूं, अच्छा चलती हूं!”
लड़का ,”यार इतना इंतज़ार किया है, २ मिनट और रुक जाओ”
लड़की ,”भाई बाहर आके मुझे खोज रहा होगा, क्लास भी लेट से छूटा था, और रुकी तो वो खोजता हुआ आ जाएगा, बाय, खयाल रखना!” इतना कहकर लड़की निकल गई, लड़का बस ये सोचता रहा, कि कितना अजीब किस्मत है, इस २ मिनट के मुलाकात के लिए क्या कुछ नहीं किए, भगवान भी तो आख़िर देखता होगा, आख़िर क्या चाहता है वो भी। इसी उदासी और खुशी भरे मिश्रित भावनाओं के साथ वो भी वहां से रुखसत होता है। हर मुहब्बत कि कहानी किसी के मरने से या हैप्पी एंडिंग से ही नहीं होता, कई कहानी का अंत एक ख़ामोश भरी मातम से भी होता है।

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