हेलो, माईसेल्फ अंशिका

 

ये वो दौर था, जब भारत में एक बार फिर से आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हो चुकी थी। विश्व स्तरीय कम्पनियाँ भी भारत में प्रवेश कर चुकी थी। लोगों को निजी क्षेत्र में भी नौकरियाँ मिलने लगी थी। इन कंपनियों की एक विशेषता यह भी थी कि यहाँ महिलाएँ भी उच्च प्रतिष्ठित पदों पर काम कर रही थी।
इनको देखकर भारत में भी महिलाओं के प्रति जो संकीर्ण नज़रिया था, वो बदलना तय था। शुरुआत धीमी ही सही लेकिन अच्छी होने वाली थी।

इन सबसे बेख़बर मैं अपनी माँ की कोख में स्थान पा चुकी थी। मुझे बहुत खुशी होती, जब मेरी माँ मुझे अपने अन्दर महसूस करके मुस्कुरा देती। मैं महसूस कर पा रही थी, उनके हाथों का कोमल स्पर्श। मेरी माँ की भी कामना यही थी कि पहली संतान बेटी हो।
हाँ, मैं पहली संतान ही तो थी उनके गर्भ में। मेरे पापा भी माँ के पास आकर बाते करते, मैं उन्हें भी सुनती। वो भी अपनी पहली संतान बेटी ही चाहते थे। ये सब सुनकर मुझे बहुत खुशी मिलती। पर जब माँ के पास आकर कुछ औरतें कहती कि बेटा होना चाहिए, बेटियाँ तो बोझ है; तब मुझे बहुत बुरा लगता। वो ये भी नहीं सोचती कि वो खुद भी किसी की बेटी थी।

खैर जो भी हुआ, मैं वो सब भूल चुकी थी; क्योंकि डॉक्टर ने कहा था कि आज मेरा जन्म होने वाला था। माँ को दर्द भी शुरु हो गये थे। मेरी भी धड़कने तेज हो चली थी। डर भी लग रहा था। घुटन भी महसूस हो रही थी। मन कर रहा था कि यहीं रहूँ, माँ के अंदर ही, नहीं जाऊँ बाहर। मुझसे माँ की तड़पन नही देखी जा रही थी। आखिरकार दुनिया में तो आना ही था, इसलिए अब बिना देरी किये मैं जन्म ले चुकी थी।अस्पताल में किलकारी गूँज उठी।

हाँ, ये मैं ही थी। आ गयी थी मैं भी इस दुनिया में, जिसका मुझे कोई अंदाज़ा भी न था। मुझे देख मेरे माँ-पापा की तो खुशियों का ठिकाना ही न था। पापा ने उस दिन पूरे अस्पताल में मिठाई बाँटी। दोनों को खुश देख मुझे भी बहुत खुशी हो रही थी।

तीन दिन बाद मुझे और माँ को घर ले आये। बहुत अच्छा लग रहा था। 4 दिन बाद मैनें देखा की घर पर बहुत से लोग इकठ्ठा हैं। माँ-पापा मुझे लेकर बैठे थे।
तभी मुझे एहसास हुआ कि शायद कोई पंडित जी मंत्र पढ़ रहे थे। शुरुआत में तो समझ नही आया पर बाद में समझ आया कि ये मेरा नामकरण हो रहा। मुझे बहुत खुशी हुई कि आज मुझे भी नाम मिलने वाला है।

“अंशिका”, हाँ, यही नाम निकाला पंडित जी ने। विरासत में मुझे उपनाम तो मिला ही था,” शर्मा”। तो मेरा नाम हो गया,”अंशिका शर्मा”। मैने अपने चेहरे पर मुस्कान बिखेर कर अपनी मंजूरी भी दे दी।

मुझे अपना नाम तो मिल गया था, पर सब मुझे अलग अलग नाम से पुकारते थे। माँ-पापा मुझे “छोटी” कहते।
ऐसे ही धीरे धीरे समय गुजरता जा रहा था। मैं अब धीरे धीरे बड़ी हो रही थी। मैने पेदल चलना शुरु कर दिया था। अब तो माँ-पापा मेरी हर खुशी का ध्यान रखते। पापा मेरे लिये पायल भी लाये। मैं उन्हें पहनकर छन-छन करती फिरती।

अब लगभग मैं 5 वर्ष की होने को आयी थी। माँ एक बार फिर गर्भ से थी। मुझे फिर से खुशी हो रही थी। मेरे साथ खेलने के लिए मेरा भाई या बहन जो भी हो, कोई तो आने वाला है। मैं दिन-भर सोचती रहती कि मैं ऐसा करुंगी, ऐसे खेलूंगी और भी बहुत कुछ। किस्मत से, माँ से मुझे भाई मिला। अब तो मेरी ख़ुशियाँ सरपट पंख फैलायें उड़ने लगी थी।

अब तो स्कूल भी शुरु हो चुके थे, हालांकि शुरुआत में अजीब सा लगा पर जल्दी ही आदत हो गयी। माँ ने मुझे सिखा दिया था कि बातचीत की शुरुआत हमेशा ऐसे ही करना,”हेलो, माईसेल्फ अंशिका!” बहुत मजा आ रहा था। ऐसा लग रहा था, जिंदगी ऐसे ही बहुत खूबसूरत होती है। शायद मुझे आने वाले समय का अंदाजा ही न था। अगले ही पल समय कौनसी करवट लेगा, इन सबसे बिल्कुल अनजान मैं अपनी ही खुशियों के संसार में खोयी रही।

मैं 8 वर्ष की होने को आयी थी। लेकिन अब माँ अक्सर बीमार रहने लगी थी। कभी कम तो कभी ज्यादा। मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है। हालांकि कुछ घर के काम भी करने लगी थी मैं, पर फिर भी माँ की लगातार बिगड़ती हालत देखी नही जा रही थी। मैं चाहती थी कि उनका सारा दुख हर लूँ पर ऐसा संभव ही नही था।

एक दिन माँ ने सुबह सुबह मुझे अपने पास बुलाया और मुझे गले लगाकर रोने लग गयी। मैं कुछ समझ ही नही पायी। आँसू मेरी आँखो में भी आ गये थे और उसी दिन माँ हमे छोड़कर चली गयी। मैं तो जैसे सुधबुध ही खो बैठी थी। समझ नही आ रहा था कि अचानक से ये क्या हो गया। घर में लोगों की भीड़ जमा हो रही थी। मेरा भाई जो अभी बहुत छोटा था, माँ माँ कह रहा था पर माँ उठ ही नहीं रही थी। मैं अपने पूरे जोर से माँ को जगाने का प्रयास करती रही पर माँ फिर भी नही उठ रही थी। इसके बाद तो मुझे कुछ ध्यान ही नही रहा कि क्या हो रहा है। मुझे जब होश आया तो देखा कि अब घर में कुछ लोग ही बचे हैं। मेरा भाई अभी भी भूख से रो रहा था, वो अनजान था इन सबसे। मैं अपने-आप में टूट चुकी थी, पर अपने भाई को बिलखता देख मुझसे रहा नही गया। मैं उठकर उसके पास गयी और उसे कसकर गले लगा लिया। मेरी रुलाई फूट पड़ी, आँसुओं की धार बह निकली। जैसे तैसे मैने खुद को संयत किया।

मुझे माँ की पुरानी बातें याद आने लगी। अब मुझमें थोड़ी हिम्मत आने लगी थी। शाम को मैने पापा व भाई को खाना खिलाया, लेकिन खुद ने नही खाया। पापा यह सब देख अंदर ही अंदर घुट रहे थे, उन्होने भी हिम्मत की और मुझे भी खाना खिलाया। मैं भी रोना चाहती थी पर घर की जिम्मेदारियों के पहाड़ के नीचे दबी सी मैं चाहकर भी ऐसा नही कर सकी।

धीरे धीरे समय ने फिर गति पकड़ी। मैं लगातार संघर्ष करती रही, लेकिन पापा को रोज अपने-आप में घुटते देखकर बहुत दुख होता, पर मैं कर भी क्या सकती थी। जिम्मेदारियाँ तो रोज़ बड़ती जा रही थी और मैं खुद को भूलती भी जा रही थी। ऐसा नही था कि मैं टूट रही थी, पर लोगों के ताने शुरु हो चुके थे। सब अपने अपने स्तर पर कुछ न कुछ बातें बनाते ही रहते।

लगभग 20 वर्ष की होने को आयी थी मैं, पर लोगों के ताने बढ़ते ही जा रहे थे। सौंदर्य और शालीनता तो मुझे माँ से विरासत में मिले थे। पर लोगों को तो बाते बनानी होती हैं, वो मुझे देख देख अजीब अजीब बातें बनाते। हालांकि मैं इन सब पर ध्यान न देती लेकिन यह बढ़ता ही जा रहा था, जो अब असहनीय भी होता जा रहा था।
एक तो घर परिवार की जिम्मेदारी उस पर भी ये सब बाते एक लड़की को तोड़कर रख देती हैं, पर मुझे माँ की बातें ध्यान आ जाती और मैं फिर से हिम्मत से जुट जाती अपने काम में।
पढ़ाई में भी मैने कई सारी मुसीबतें झेली, पर वहाँ कुछ अच्छी दोस्त भी मिल गयी। जिनसे बात कर मुझे सुकून मिलता, लेकिन रिश्तेदारों को मेरा ये सुकून खटकता। वे तरह तरह की बातें बनाते, इल्ज़ाम लगाते। कभी कभी तो यह बहुत बेहूदा इल्ज़ाम भी लगाये गये मुझ पर, लेकिन मैं अपनी माँ से मिले संस्कारों के कारण चुप रहती। कई बाधाओं सें जूझते हुए भी मैं अपनी पढ़ाई को पूरा करती रही, साथ ही घर की जिम्मेदारियाँ भी बख़ूबी निभा रही थी।

घर-परिवार का खर्च चलना मुश्किल हो चुका था और मैं भी परेशान हो चुकी थी रोज़ की परेशानियों सें। मैं अब बाहर निकल कर नौकरी करने का सोचने लगी परन्तु सब कुछ इतना आसान नहीं था। मैं जहाँ भी इंटरव्यू के लिए जाती, सबसे पहले अपनी माँ से मिली बात ही दोहराती,”हेलो! माइसेल्फ अंशिका” इसके बाद मैं आगे के जवाब देती। खैर जैसे तैसे मुझे अपनी पहली नौकरी मिल भी गयी। मैं फिर सें खुश होने लगी थी, लग रहा था खुशियाँ दरवाजे पर दस्तक दे रही थी, पर शायद होनी को ये मंजूर ही न था।

मैं लगातार प्रयास किये जा रही थी, कि सब अच्छा हो जाये पर लोगों के ताने कम होने की जगह बढ़ते ही जा रहे थे। फिर भी मैने हिम्मत नही हारी, मैं लगातार प्रयास करती रही। भाई भी अब बड़ा हो रहा था, लेकिन मैं उस पर जिम्मेदारियों का बोझ नही डालना चाहती थी, इसलिए सारा काम मैं ही देखती, पर लोगों को ये भी न देखा गया। वो मुझ पर भाई का हक खाने का इल्ज़ाम लगाने लगी, लेकिन मैं फिर भी करती रही अपने परिवार के लिए। हालांकि मैने इस बीच कुछ कठिन फैसले भी लिए, लेकिन वो लोगों को नज़र थोड़े न आते है। लोगों को तो मसाला चाहिए बातें बनाने के लिए।

पापा भी अब अस्वस्थ रहने लगे थे। मेरे सामने अतीत डोलने लगा था। डर रही थी कि माँ की तरह पापा भी हमे छोड़कर न चले जायें। अक्सर बुरे सपने आते, मैं रात-रात भर सो नही पाती। अकेले में डर भी लगता, माँ की बहुत याद आती थी, पर क्या कर सकती थी। आखिर मैं भी तो एक इंसान ही थी।

पापा की रोज़ रोज़ बिगड़ती हालत अब असहनीय होती जा रही थी। मैं रोज़ खुद को जिम्मेदारियों के दलदल में धँसा हुआ पाती थी। देखते ही देखते पापा भी एक दिन हमें छोड़कर चले गये, लेकिन मैं भी उनके साथ ही अपना वजूद खो बैठी थी। अब मेरा पूरा ध्यान मेरे भाई पर था। दिन गुजरते जा रहे थे पर माँ-पापा की बहुत याद आती। अंदर से पूरी तरह टूट चुकी थी मैं, पर भाई को संभाले रखना था।

अब तो लोगों को मौका मिल गया था, खुलकर ताने कसते, उल्टी सीधी बाते बनाते। बहुत से रिश्तेदार जो कभी मिलने भी नही आते थे, अब हर वक्त बार बार आते रहते और भाई को भड़काते कि मैं अपने भाई के हक का खुद ले लूंगी; पर मुझे इन सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता, जब मैं अपने भाई को अपने साथ खड़ा पाती। लेकिन दुख भी होता था, जब वो उन लोगों को कोई जवाब नहीं देकर उनकी हाँ में हाँ मिलाता रहता।

मुझे माँ से विरासत में मिली खूबसूरती के कारण अब कई रिश्तेदार आते और कईं अजीब अजीब से रिश्ते लाते, लेकिन मुझे अभी भी अपने भाई की ही फिक्र रहती। मुझे नही पसंद था ये सब, पहले मैं अपने भाई को सक्षम बनाना चाहती थी। मेरे हर बार मना करने से अब तो लोग चरित्र पर भी उंगलियाँ उठाने लगे थे। अब सहनशक्ति के बाहर हो गया था सब कुछ। अब मैं भी लोगों को पलटकर जवाब देने लगी थी। लोग मुझे बदतमीज़ भी कहते, लेकिन अब कोई फर्क नहीं पड़ता।
एक तो खुद आगे से बाते बनाओ, मैने पलटकर एक जवाब क्या दे दिया, मैं तो बदतमीज ही हो गयी। लेकिन समझ चुकी थी कि अब ऐसा ही करना पड़ेगा, लोगों के मुंह पर ताले लगना जरुरी भी हो गया था। हालांकि उनकी बातें कम हो गयी थी, लेकिन मेरा संघर्ष अब भी जारी था, भाई को आत्मनिर्भर बनाने का।

और ये संघर्ष अब भी जारी है। हारी नहीं हूँ मैं, एक दिन जीतना ही है मुझे, लेकिन संघर्ष कब तक चले, कोई अनुमान नही मुझे।
लेकिन अब मैं खुद के लिए ही नही करती, अब मैं भी उन लोगों का सोचती जो कभी मेरी तरह घबरा जाते थे।
अब मैं रोज़ जीत जाती हूँ एक जंग, जब किसी की परेशानी दूर करती हूँ। ख़ुशियाँ फिर से दस्तक दे चुकी है। अब मैं भी रोज़ उड़ती हूँ नीले आसमान में, बताना चाहती हूँ कि आसमाँ अब मेरा है।
अब किसी को भी परेशान नहीं होने दूंगी मैं, जो मैने झेला है, सबको नही झेलने दूंगी मैं। अब तो मुझे देख संबल मिलता है, अंदर से टूटे हुए लोगों को। कभी आदी थी संघर्षों की, आज उम्मीद बन गयी हूँ मैं।
ये वक्त भी अब मेरा है, और आने वाला वक्त भी।

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