हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी…

आज पूरे छह महीनों बाद कुछ लिख रही हूँ… वक़्त तो बहुत था, मसला होता है तो बस मन का, ये कब किसी के बस का हुआ है…

चलिए “फाज़ली” साहब के एक शेर से शुरुआत करते हैं –
“हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी,
जिस को भी देखना हो कई बार देखना…”
ये शेर अभी क्यों ?
दुनिया लड़ रही है, जान के लिए, और जो जान बचा पाए हैं वे लड़ रहे हैं अपने आप से, ये जो साल भर से ज़्यादा का दौर रहा है इसमे ऐसे कितनों की असलियत सामने आई, कौन सच में हमारा है पता चला, और ऐसे हज़ारों चेहरे सामने आए जो बिना किसी रिश्ते, बिना पहचान के भी लोगों की मदद में लगे हुए हैं…
ये शेर अभी के माहौल में बिल्कुल सही बैठ रहा है, ना जाने कितनों को हम अपना समझ उनके दुखों में भागीदार बनते आए, ना जाने ऐसे कितने थे जिनके मुखौटे के पीछे के चेहरे इन अँधियारे दिनों मे साफ दिखे, क्योंकि ये वही शैतान हैं जो अन्धेरे में वार करते हैं, उजाले में ये आप-मुझ समान ही दिखते हैं, ये प्रजाति एक विशेष वर्ग की ही होती है, जो अपना उल्लु सीधा कर निकल जाते हैं, वैसे इन लोगों को बाद में दुनिया “अपशब्दों” से ही सम्बोधित करती है…
खैर…
एक और शेर है इसी ग़ज़ल का-
“दो चार गाम राह को हमवार देखना,
फिर हर क़दम पे इक नई दीवार देखना…”
बहुत से आते हैं ऐसे शख्स भी जिन्दगी में जो कुछ कदमों तक तो आपके पैरों के नीचे अपने हाथ रखते चलते हैं, पर ये भी वही होते हैं, उसी वर्ग के, एक बार इनका मतलब निकल जाए फिर ये हर कदम पर आपके लिए मुसीबत खड़ी करेंगे, क्यों? शौकिया तौर पर, हाँ असल में…
इन सब का जिन्दगी में एक अलग महत्व है, ये तजुर्बा आपको जो अहसास देता है ना “let it be” वाला, ये आज के दौर का सबसे बड़ा ज्ञान है, हाँ मानिये मेरी बात, ज़रुरी हैं इस प्रजाति के लोगों से सामना…
क्योंकि कुछ भी यूँ ही नहीं होता…
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