रात

*रात*

मैं रात फिर से गहराती जा रही हूँ।
फिर से मुझे देख बच्चे डरते जा रहे हैं।
भूत और चुड़ेल अपनें काम पर निकल रहे हैं।
मैं अपना आकार फैलाती जा रही हूँ।

है मुझमें समाया डर का अंश सदा से
मेरे वक्त में इसलिए भी सब आँखें बंद करना चाहते,
डर की बंदिशो से आजाद होकर रातों में घूमना चाहते
लेकिन फिर भी सदा भागते हैं दूर मुझसे

सबको भोर प्यारी होती हैं,
मुझे पाकर चमगादड़ और उल्लू खुश हो जाते
ये जानवर है या भरे है लबालब आशिकी से
ये तो रातें भी जागकर ही बिताते,

आज हो रही महफिल मेरे समक्ष फिर से भूतों की,
ये जो ध्यान मग्न हो देख रहा यहाँ है,
आज इसके होश को उड़ाना है।
मैं हूँ इक काली रात अमावस की,
मुझे बस डर और अंधकार ही तो फैलाना है।

Krishan Kant Sen⁩

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