माहवारी

 

आज भी दर्द उसके चेहरे पर झलक रहा था
आज भी आँसुओं की धारा उसने बहाई थी
रक्तस्राव का दर्द झेल रही थी वो अभी
फिर भी यह बात उसने सबसे छिपाई थी
पर उससे ज्यादा दर्द उसे दिया अपनो ने
इस हालत में सबने उससे दूरियाँ बनायी थी
वो भी तो रूह का एक नया जन्म ले रही थी
कुछ भी नया था नहीं, बस माहवारी आयी थी।
इतनें भर से उससे दूरियाँ बना ली अपनों ने,
माँ बनने का वरदान भी तो साथ पायी थी।
कसक बस रही उसके दिल में अब यही
माँ बनने पर खुश तो सब होंगे
पर माहवारी में क्यों सब रूसवा हो रहे
सबके साथ मिल कर ही तो रहना है मुझे
फिर क्यों मुझे अकेलेपन में डुबो रहे

Krishan Kant Sen

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