माँ

“माँ”, यह वो शख्स है जिसने अपने गर्भ में नौ महीने पाला-पोसा | हमारी माँ ही हमे इस दुनिया में लाती हैं|
उसी माँ के लिए एक कविता-
ना परवाह मुझे इस दुनिया की|
इस दुनिया ने मुझे क्या है दिया|
क्या इसने मुझे रोटी दी
या बेपरवाह प्यार दिया||
जान सके जो कीमत तेरी
ऐसा ना कोई इंसान बना|
तेरे हाथों मेरी किस्मत लिख के
उस भगवान ने किया मुझपे एहसान, माँ||
“दुनिया में बने,दुनिया में मिटे पर दुनिया के हैं खिलाफ हम |
जो जाना होता दुनिया को , ना कर पाते इंसाफ़ हम||”
ये सीख तूने दी थी हमको
सोचकर कुछ खास माँ|
रखती हूँ तेरी इन सीखों को
खुदसे भी पेहले आज माँ||
वापस दोहराॐ वही बातें तेरी
तुझसे मेरा ये जहान माँ|
तेरे हाथों मेरी किस्मत लिख के
उस भगवान ने किया मुझपे एहसान ‘माँ’||

माँ के वर्णन में कोई भी शब्द छोटा ही पड़ जाता है|
इस विषय को समाप्त करने से पहले, माँ पर एक श्लोक-
नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रपा॥
अर्थात माता के समान कोई छाया नहीं, कोई आश्रय नहीं, कोई सुरक्षा नहीं। माता के समान इस विश्व में कोई जीवनदाता नहीं॥
माँ का आदर करें और उनके साथ रहें|

धन्यवाद
जय हिंद🇮🇳

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