महाराणा प्रताप

वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप सिंह हमारे समाज व क्षत्रिय समाज की वो विभूति है जो हमे हमारे हृदय में गौरव की ज्वाला प्रफुल्लित कर देता है – प्रताप का जीवन संघर्ष वो दृश्य है जो सामान्य शब्दो में कतई नही समझ सकते, उस संघर्ष को शब्दो का वो रूप देना पड़ता जो सीधा हमारे हृदय में हस्तक्षेप करे :-

भयवान भोर दृश्य वो, हर और में संताप थे,
हर छोर में देश लूटने को कातिल सर्वव्याप थे।
उपद्रव थे हो रहे, जालिम बढ़ रहे सब पाप थे,
एक अकेले उस समर में लड़ रहे प्रताप थे।

सदियों से होते नरसंहार को, देख प्रताप विचलित थे,
ना झुके प्रताप भी, क्षत्रिय बलिदानों से प्रचलित थे।
रजपूती धर्म बचाने को, केसरिया मात्र लहराने को,
क्षण क्षण में शोणित बहा रहे थे, क्षत्रिय कहलाने को।

वो एकलिंग की ज्वाला भी धधक रही थी सीने में,
जा वीरगति से लड़ते थे, बलिदान था जीवन जीने में।
कहते थे प्रताप, जब मेवाड़ मेरे साथ है तो डरने की क्या बात है
बाकी तो छिन्नमस्ता काल भैरवी, जय भवानी मेरे साथ है।

हुआ समर हल्दीघाटी का, तो भीषण काया कटती थी,
झेल प्रताप के शौर्य को, मुगलों की सेना घटती थी।
संशय आने को मात हुई, तो पीछे मुगलो के सेना हटती थी,
घोर चिताओं के प्रांगण में, करतार काया से निपटती थी।

आते प्रताप को देख जब, अकबर खुद देहलाया था,
खुद जां बचाने को, उसने बहलोल को बहलाया था।
आते देख बहलोल को, दो हिस्सो मे सुलाया था,
कर एक ही वार में, घोड़े समेत चार हिस्सो मे काटा था।

अलौकिक सा शौर्य था, राणा प्रताप की भुजाओं में,
एक एक कर जा रहे थे मुगल अपनी चिताओं में।
वो चातक सा प्यासा था, कर रक्त से अपनी प्यास बुझाई,
कर मुगलों का संहार फिर, केसरिया को विजय दिलाई।

जीवन भर जिसने साथ दिया, वो चेतक भी सोया था,
युद्ध जीत कर भी राणा ने अपना भुजबल खोया था।
संतापो के बीच रामप्रसाद ने भी स्वाभिमान का बीज बोया था,
रण जीतकर भी राणा इन दो रत्नों पर रोया था।

वो हल्दीघाटी फिर रोई, देख मेवाड़ी बलिदानों को,
अकबर की तो रूह कांपी, देख भरे कब्रिस्तानों को।
वो भी रोया फूट फूट कर देख साहस की कहानी को,
वीरगति पर जय पाकर, काल चक्र को भी तोड़ा था।

बन कर भी मृत्युंजय, वक्त रह गया था थोड़ा,
एकलिंग की शरण में सोते सोते, राणा प्रताप ने दम तोड़ा था।

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