मनोव्यथा में निकले शब्द

 

वो भी तो आँख रोई होगी,

जिसने अपनी बेटी खोई होगी,

वियोग पूछो उस माँ से,

वो कैसे रात में सोई होगी,

क्यों अखबार चुप बैठे हैं,

क्यों अब कलमें शांत हो गयी है,

क्यों कानों पर पहरा है,

क्या कोई सन्ताप इससे भी गहरा है,

ये पीड़ा भयंकर है,

मानवता का ढांचा जर्जर है,

छिपी हुई है दयालुता कहीं,

कृतघ्नों की ये धरती अब बंजर है,

मन चकित है और विचलित भी,

परेशान है और व्यथित भी,

किस समाज का अभिमान है,

ये कैसी वीरता का प्रमाण है,

जहाँ, ज़िन्दगी केवल लपटों तक,

और गुहार केवल लपटों तक,

दृश्य वीभत्स हो या हो दृष्टि संकीर्ण,

दण्ड हो एक न कि प्रकीर्ण,

तुम झांसी की गाथा सुनाते हो,

तुम काली का पाठ पढ़ाते हो,

तुम कन्या भोज करते हो,

और कन्या रक्षा में असमर्थ हो जाते हो,

अब कहाँ गोविंद आते हैं,

किस द्रौपदी की लाज बचाते हैं,

कलयुग की चर्चा जब भी होगी,

एक माँ बेबस होकर रोती होगी।

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