“बहुत कुछ कहना चाहती हूँ मैं”

बहुत कुछ कहना चाहती हूँ मैं,

अपना दिल खोल के रख देना चाहती हूँ मैं।

तुम्हें गले लगाकर रोना चाहती हूँ मैं,

तुम्हारे कंधे पे अपना सिर रखकर सोना चाहती हूँ मैं।

बहुत कुछ कहना चाहती हूँ मैं,

अपना दिल खोल के रख देना चाहती हूँ मैं।

लेकिन कहीं तुम बुरा ना मान जाओ, ये सोचकर चुप रह जाती हूँ मैं।

बहुत बड़ी पागल हूँ, क्या करूँ मैं अपना?

खुद से ही सब कुछ कह जाती हूँ मैं।

बहुत कुछ कहना चाहती हूँ मैं,

अपना दिल खोल के रख देना चाहती हूँ मैं।

तुम्हें समझना और खुद को समझाना चाहती हूँ मैं,

ज़िंदगी के सफ़र में तुम्हारे साथ दूर तक जाना चाहती हूँ मैं।

ज़्यादा कुछ नहीं, बस तुम्हारा प्यार और खुद के लिए छोटी सी जगह चाहती हूँ मैं,

बनना तुम्हारी खुशियों की वजह चाहती हूँ मैं।

बहुत कुछ कहना चाहती हूँ मैं,

अपना दिल खोल के रख देना चाहती हूँ मैं।

अगर कभी मैं रूठूं, तो तुम मुझे मनाओ इतना चाहती हूँ मैं,

लड़ाई में कभी तुम जीतो तो कभी तुमसे जीतना चाहती हूँ मैं।

बहुत कुछ कहना चाहती हूँ मैं,

अपना दिल खोल के रख देना चाहती हूँ मैं।

-निशा जाटव 💙

 

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