नारीवाद और नारी सशक्तिकरण के बीच खड़ी नारी

नमस्कार! नारीवाद हमारे देश में एक अहम मुद्दा निकल के आया है फिर चाहे “मीटू अभियान” हो या “इट्स हर चॉइस” भारत में नारीवाद के कई रूप मिलेंगे | अरे एक चीज़ तो भूल ही गया नारीवाद को अंग्रेजी में फेमिनिस्म के नाम से जाना जाता है और ये फेमिनिस्म भी अपने मूल बातों को भूलता जा रहा है जैसे मैं नारीवाद के मतलब को बताना भूल गया |

नारीवाद के औचित्य को जाना जाये तो समझा जा सकता है कि नारीवाद एक नारी सशक्तिकरण का ही रूप था, कोई इतिहास की बातें नहीं करूँगा बस इतना समझिए की महिलाओं को समान आज़ादी व मर्दों के बराबर रहने की बात की गयी थी | जो कि काफी अच्छी बात है, महिलाएं भी मनुष्य का एक रूप हैं और और हर रूप को समान हक मिलना चाहिए, पर कहीं न कहीं ये सारी बातें कही खो गयी हैं |

नारीवादी के नाम पर गलत ख़बरें फैलाना, झूठे रेप या छेड़खानी के मामले उठाना आम सी बात हो रही है, अमूमन देखने को मिलता है किसी व्यक्ति को लड़की छेड़ने के मामले में पकड़ा गया और अंत में पता चला की वो जुर्म तो हुआ ही नहीं था | मैं ये नहीं कह रहा की रेप, दुष्कर्म या छेड़खानी नहीं होती या वे सही है, मेरा तात्पर्य यह है कि जब गलत होता है तो आवाजें कहाँ चली जाती हैं | अब दुर्भाग्य यह भी तो देखिये ना कि अपनी बात को बताने के बाद सफाई देने की आवश्यकता पड़ रही है |

हमारे देश में आज भी महिलाओं की हालत बुरी है, ऐसे गाँव के तमाम क्षेत्र हैं जहाँ महिलाएं अपने हक के लिए नहीं बोल पाती हैं, अपने सपनों को उड़ान नहीं दे पाती हैं और जिन चीज़ों को उनपे थोपा जाता है वो सह कर रह जाती हैं | घरेलु हिंसा, दहेज़ के लिए प्रताड़ना या बच्चे के लिए सताया जाना बहुत आम है | सोचना ये चाहिए की ये नारीवाद के झंडे को लेकर चलने वाले लोग इनके लिए क्यों नहीं खड़े होते | क्यों नहीं तब खड़े होते जब भारत में १०० से भी ज्यादा लड़कियों के साथ प्रतिदिन दुष्कर्म होते हैं, कहाँ चली जाती हैं आवाजें जब एक लडकी को ये कह कर चुप करा दिया जाता है कि तुम्हे तो किसी और के यहाँ जाना है या जब उसका बाल विवाह कराया जाता है | ये नारीवाद केवल सिगरेट या शराब पिने से नहीं होता है, इससे किसी अभागे को इंसाफ नहीं मिलेगा | बल्कि ये तो आपके सेहत के लिए हानिकारक है, हानिकारक सबके लिए फिर चाहे लड़का हो या लड़की सेवन करने वाला या ना करने वाला, चपेट में सब आते हैं |

जब हम बात करते हैं नारी सशक्तिकरण की तो हम बात करते हैं उन महिलाओं की जो आज भी कहीं दबी हुई हैं, बाप की आवाज़ के निचे, पति के जूते तले, ससुराल के बोझ के निचे या समाज की संकीर्ण मानसिकता के निचे | हम बात करते हैं उन्हें इन सब बन्धनों से बहार निकाल कर उनको आज़ादी दिलाने की और ऐसे में इसका निर्वहन उन लोग को करना चाहिए जो इन सारे बन्धनों से आज़ाद हो चुकी हैं या उन्हें कभी ये दिया ही नहीं गया | हमने अभी कुछ ही दिन पहले अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया, मैंने देखा कई लोग बधाइयाँ दे रहे थे, अच्छी बात है ख़ुशी हुई, पर अगले ही दिन सारे मसले शांत | या अगर उस ही दिन उन महिलाओं को मदद करने का संकल्प किया जाये जहाँ पे महलाएं परेशान है तो अच्छा और लगता | ऐसे तमाम संस्थान हैं जो महिलाओं के उनके अद्यमी बनने पर या समाज की कुरीतियों को तोड़ कर नये आयाम को साकार करने पर उन्हें पुरस्कृत किया जो की सराहनीय है, उन महिलाओं को मेरा भी सलाम है | अब समझना ये चाहिए की नारीवाद के झंडे को लेकर चलने वाले लोग इन महिलओं को मिसाल के तौर पर उन महिलाओं को समझाएं जो आज भी दबी व पिछड़ी हैं, तभी नारीवाद सफल हो पायेगा |

यही कुछ बात थी जो कई दिनों से सोच रहा था और आपके समक्ष रखने का इच्छुक था, आशा करते हैं की आप इसे समझेंगे क्योंकि नारी को न नारीवाद में जगह मिल रही है और न ही वो सशक्त हो पा रही है |

धन्यवाद,

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