ज़रा पंख तू अपने फैला

क्यों हताश है तू क्यों निराश है,

किस बात की तुझको तलाश है।

माथे पर शिकंन और होठों पर क्यों अनकहें सवाल है।

ज़रा पंख तू अपने फैला,

क्या डर है तुझको भला?

ऊँची तू परवाज़ भर,

गिरने न तू डर।

रोज़ मेहनत से अपने सपनो के घरौंदे का ताना बाना बुन,

ख़ुद अपनी राह चुन।

-खाँन अतिया रफ़ी

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