जमीन-ए-तकदीर

सुख दुख – उतार चढ़ाव वाली जिंदगी में तकदीर की तार पर जब इंसान खड़ा हो जाता है, तब उस व्यक्ति का जीवन एक अंतर्मन के एकांत में कही गुम हो जाता है, गुम हो रहे उस जीवन को बचाने के लिए जब भी इंसान कुछ सोचता है – तो वो अपनी कहानी को कुछ इस तरह बयां करता है जिसे सिर्फ वही समझ पाता है या फिर वो जो खुद इस दरिया में डूबा हो, क्युकी ये दर्द सामान्य शब्दो मे बयां नहीं हो सकता – इसे जब आस पास की विडंबनाओं की उपमा दी जाए तभी कागज़ पर पर इस दर्द की स्याही निखरती है, और जीवन कहलाता है साहित्य।

—– जमीन ए तकदीर —–
Part 1

इक बंजर सी जमीन थी,
अचानक कुछ पौधे उग आते है।
तकदीर को रास न आते,
मुसीबत के तौर पर आंधी को पाते।

जमीन ने खुद ही को खोदा था,
खुद ही को सींचा था।
पोधो ने खुद ही को खींचा था,
पर तकदीर तेरा पैमाना नीचा था।

धैर्य का पैमाना थामे जमीं भी मौन थी,
उस आंधी की ज़िम्मेदार वो तकदीर कौन थी।
राहत ए सांस जमीं पर कुछ बादल आए थे,
बरसे भी तो कैसे,
जमीं पर जो तकदीर के काले साये थे।

:- Dee✍️

——– जमीन ए तकदीर ——-
part – 2

फिर दुबारा मौसम आया था बारिश का,
जमीं का भी मन था तकदीर से सिफारिश का।
पर तकदीर भी न जाने क्या मन बनाए बैठी थी मानने को,
बेसब्र सी थी जमीं भी हकीकत जानने को।

हुआ कुछ यू, जब बारिश ने भी मन बना लिया था,
जमीं और पोधो ने भी खुदको सजा लिया था।
तकदीर ने भी और इतराने का नया फज़ा लिया था,
तो तकदीर ने फिर जमीं को बजरपं में फसा लिया था।

फिर फस चुकी थी जमीं बंजरपन के बोझ में,
तकदीर की तरकश से पोधे भी थे मरने की ओझ में।
देख बागबान की व्यथा जमीं थी गहरी सोच में,
मरता देख पोधों को फिर जमीं थी बारिश की खोज में।

अपनी आंखो से जमीं ने हर एक पोधे को मरने दिया था,
बागबान के खातिर जमीं ने मजबूरी का जहर पिया था।
वक़्त के आंगन में तकदीर ने जमीं को बेसहारा किया था,
लेकिन जज्बाती जमीं ने फिर खिलने का निश्चय किया था

:- Dee✍️

——- जमीन ए तकदीर ——
part 3

हुआ फिर निश्चय तोह जमीं फिर खिलने को तैयार थी,
पौधों को फिर खिलता देखने को बेकरार थी,
तकदीर की तरकश फिर भी बरकरार थी,
अचानक आ जाते है कुछ बादल फिर जमीन पर।

बारिश की आस छोड़ जमीं ने अंदर से पानी सींचा था,
रुबरु थी इससे भी तकदीर की तरकश भी,
तभी तकदीर ने फिर बादलों को जमीन पर खीचा था,
आ चुकी थी जमीन क़यामत के नए मोड़ पर,

पौधों के खिलने के बाद,
अचानक फिर बारिश आती है,
ज़िन्दगी की हकीकत – जमीन किसी से कह नहीं पाती है,
ना जाने कैसा था ये तकदीर का कहर,
बारिश आयी भी अगर तो पानी में था जहर।

क्या चाहती है कुदरत जमीन कि तकदीर से,
मृत थी जमीं लेकिन बस ज़िंदा थी शरीर से,
दुख के दरिया में डूब चुकी थी जमीन भी,
कुछ ऐसा है मंज़र !
आग का दरिया है और तैर के जाना है।

:- Dee✍️

To be continued…………

अपने दर्दों को इस रूप में बयां कर कवि का जीवन खुद एक साहित्य रूप में स्थापित हो जाता है और साहित्य की सीमाएं अतंत है, जब तक व्यक्ति की सांसे चलती है तब तक उसके साहित्य रूपी कहानी की स्याही भी चलती है।

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