छंद

मैं किसी घड़ी सा रुका रहा था,
तू वक़्त के जैसे गुजर गई थी,
मैं तेरे प्यार में बिगड़ गया था,
तू मेरे प्यार में सुधर गई थी।

होश जो आया मुझको तो मैं फिर,
छोड़ के मोह मैं बन बैठा जोगी,
करके प्रतिज्ञा मैं आगे बढ़ा था,
मिल के रहेगी जो मेरी होगी।

कार्य प्रगति का मार्ग बताकर,
बना गए वो मुझे प्रेम रोगी ,
त्याग दिया था सब मोह माया,
बन जो गया था मैं कर्मयोगी।

करते हुए विनती पास मेरे आई,
कहने लगी पीड़ा मैंने भी भोगी,
हे करुणा निधि प्रेम के स्वामी,
मुझको बनालो अपनी संजोगी।

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