“आम लड़की की ज़िंदगी”

कैसे सुनाऊँ मैं आप-बीती?

खेल गयी खेल मेरे साथ नीति।

नहीं है मुझे इतनी भी आज़ादी कि जाऊँ मैं घर से बाहर भी,

नहीं जानती मैं कि कैसी है शक्ल इस दुनिया की।

नहीं है मुझे इतनी भी आज़ादी कि मैं अपने दोस्त बनाऊँ,

कहा जाता है मुझे कि मैं घर से स्कूल और स्कूल से सीधा घर आऊँ।

हर दिन मेरा यहाँ रो-रो कर निकलता है,

यही सोचती रहती हूँ कि मेरे घरवालों का दिल क्यों नहीं पिघलता है?

“अकेली कहीं नहीं जाना”, ये कैसी सोच है भला?

इसी सोच के कारण मैंने अपनी खुशियों का घोट दिया गला।

दम घुटता है अब मेरा इस जेल मैं,

पीछे रह गयी हूँ मैं इस ज़िंदगी के खेल में।

लेकिन मैं कभी हार नहीं मानूँगी,

इतनी मेहनत करूँगी कि पूरी दुनिया को जानूँगी।

मेरे घरवालों की सोच खुद बदल जायेगी,

जब उन्हें लगेगा कि हमारी बेटी बहुत आगे तक जाएगी।

-निशा जाटव 💙

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