आज की नारी

वो दौर गुजर गया जब
नारी अबला होती थी
अपने हक के लिए भी
नहीं कभी वो कहती थी
अत्याचार और दुष्टता को सेहकर
अपराधों को जिसने बढ़ाया था
आज के युग में उसी अबला ने
शक्ति का रूप दिखाया है
स्वयं की रक्षा के लिए ढाल बन दिखलाया है
अंगारों पर चलती हैं वो
अपना अधिकार पाने को
आबरू से उसके करे खिलवाड़ कोई
तब तुरंत काल बन जाती है वो
जुल्म अगर उसपर हो
आवाज़ अपनी उठाती है वो
गुनहगार को सज़ा दिलाकर ही
सुकून और चैन पाती है वो
बोझ बनकर नहीं, सम्मान से जीवन बिताती है वो
आज की नारी होकर
रसोई से लेकर देश की शोभा बढ़ाती है वो
करो सम्मान उसका जिसने
हमे दुनिया में लाया है
मां, बेटी, बहन, बहू बन
हमारे जीवन को सवारा है।,

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