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आज भी सपनों के जनाजे पर ना जाने कितनी शहनाइयां बजती है?

औरत बनने में ना जाने कितनी आवाजें दबती?

पर मुझे अपने कोशिश पर नाज है,

बैंड बाजे से भी ज्यादा बुलंद मेरी आवाज है।

तो क्या हुआ अगर समाज और मेरे बीच बनती नहीं?

मैं अकेली हूं पर अपूर्ण नहीं।

गले में मंगलसूत्र के जगह मेडल भी पहन सकती हूं,

और इसके लिए मुझे अपना सरनेम हटाने की जरूरत भी नहीं।

हाँ मैं अकेली हूं पर अपूर्ण नहीं।

कदम से कदम मिलाकर चल सकती हूं,

कंधे मिलाकर चलने की जरूरत नहीं।

हाँ मैं अकेली हूं पर अपूर्ण नहीं।

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