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जन्नत मेरी तुमसे थी
तुम मेरे आसमान थे
करोड़ों के भीड़ में भी
तुम ही इस दिल के मेहमान थे

कद्र नहीं कि तुमने मेरी
वरना जान तुझपे लूटा देते
तेरे दिल की राहों में ही
जीवन अपना बीता देते

फर्क तुम्हे ना पड़ा लेकिन
जिंदगानी मेरी पलट गई
दुख ने ऐसा घेरा मुझे
सूरत मेरी बदल गई

अब यादों के सहारे तेरे जीती हूं
अपने ज़ख्मों का ज़हर भी पिती हूं
कसमकश में रहती हूं हरपल
लेकिन किसी से कुछ नहीं कहती हूं
बहुत मुश्किल से जुदाई का दर्द मै सहती हूं
फिर भी कुछ ना कहती हूं।

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