मोह

किसी ने बहुत सही कहा है, सारे दुःख का कारण मोह है। यूं तो मोह की परिभाषा अपने अपने हिसाब से लोग समझते आए हैं। मेरा मानना है इस संसार में हर चीज़ की एक उम्र होती, उसका अंत एक न एक दिन निश्चित है! फिर चाहे वो मनुष्य हो, प्रकृति हो, जीव हो, कोई वस्तु हो या कोई रिश्ता।
मेरे पिताजी को बचपन से एक अजीब शौक था, खरगोश पालने का, चूंकि आधे से ज्यादा जीवन किराए के घर में गुज़रा, जब अपना घर हुआ तो पापा को लगा कि अब ये इच्छा पूरी की जाए। हमारा घर शहर से थोड़ा लगा हुआ है, शांत इलाका है, घर में वक्त बेवक्त मां अकेली रहेगी इस कारणवश मैंने भी एक जीव लाकर घर में रख दिया, एक डॉगी जिसे हमलोग “लूसी” कहते हैं! ये चीज़ हमें बाद में मालूम हुआ कि खरगोश काफ़ी नाज़ुक दिल का जानवर है, उसकी मौत डर से भी हो जाती है, पापा 2 जोड़ी खरगोश लाए तो देखते देखते 2 से कब 16–17 हो गए पता नहीं चला। चूंकि अब हमारे आंगन में उनका आतंक फैलने लगा था तो हम ने तय किया कि 1 सबसे पुरानी को रख कर बाकी को रिश्तेदारों में ,जिन्हे पालने का शौक है, बांट देंगे। सबसे उम्रदराज होने के कारण मां उस खरगोश को हमेशा से “डोकरी” कहते आई है। और डोकरी के अजीबो गरीब शौंक, जिसमें सबसे ऊपर रहा काली चाय पीना! दिन में 2 बार या जब भी चाय बनने को चढ़े, वो आंगन के किसी कोने में रहे, आ ही जाती थी, और इतने चाव से पीती कि देखते रहने को दिल चाहे! लूसी और उसकी दोस्ती काफ़ी पक्की हो गई थी। सुबह सुबह हर रोज़ डोकरी की यही आदत कि लूसी जहां भी सोए रहे, जाके उसके कान चाटो और इसको परेशान करो, लूसी बेचारी हमारी डर से मौन होके सह लेती थी। जब भी थोड़ी देर के लिए घर से बाहर जाएं, तो लूसी को लेकर और डोकरी को घर पे छोड़कर जाएं, वापस आने के बाद पूरे आंगन में जब लूसी उसको ख़ोज न ले, तब तक लूसी को चैन नहीं आता। शाम 7 बजे पापा के घर आने के वक्त, जहां पापा जूते उतारते हैं, लूसी और डोकरी रोज़ वक्त पर हाज़िरी देना नहीं भूलते। डोकरी को चने का भी शौंक बहुत रहा, उसके लिए घर में अलग से चने आते। घर से कुछ दिन बाहर जाने पर मन में खरगोश का खयाल लगा ही रहता था, पर वापस आते तो हमेशा सही सलामत कहीं न कहीं छुपी मिलती। घर वालों के आंख से ओझल होकर फूलों को कतरना डोकरी का प्रिय काम था।
इस दफे 3 दिन के गांव से वापस आए तो डोकरी दिखी नहीं, आश्चर्य ये कि इस बार लूसी भी खोजने नहीं गई। चाय चढ़ाने पर भी वो नहीं आई, पापा अंधेरे में टॉर्च लेकर ढूंढने गए तो आंगन के एक कोने में बेचारी मृत पड़ी थी, अब ये पता ही नहीं कि किसी जानवर ने उसी मारा या आस पास के किसी ने! जिस दिन से उसको रखे थे घर में, मां बोल बोल के थक गई, मत रखो कुछ हो गया तो दुःख होता है, आज मेरे घर में मातम सा पसरा है! मां, पापा और मेरा तीनों का खाने का मन नहीं है। जीवन में मैंने बहुतों को खोया है, जानवरों से रिश्ता भी बस इसलिए बनाया कि ये तो कम से कम नाराज़ नहीं होते! मां का चढ़ाया चाय बनकर तैयार तो था, पर पीने का दिल नहीं कर रहा। हम तीनों को मालूम है, रोज़ अब चाय के वक्त उसकी याद आएगी। मां ने तो आज तय भी कर लिया है अब इस घर में कभी और कुछ नहीं पाला जाएगा!
मेरी मां हमेशा कहती है “ये बेजुबान जीव भी बात कर पाते तो कितना अच्छा होता न! बेचारे अपना दुख किसी से कह नहीं पाते!” सुनने में हास्यास्पद लगेगा, पर इंसान भी कितना अजीब है न, जो जानवर इंसान को नुकसान तक नहीं पहुंचाते उसी को ज्यादा मार कर , अपने खुशियों में बाटकर खाते हैं, हिंसक जानवर को नहीं! इंसान इसे अपना हक़ समझता है! खैर ये तो अलग बहस का विषय है। बहरहाल, इतना तो समझ आ ही चुका है, मोह से कितना दुःख मिलता है, अब दोबारा “किसी भी चीज़” के मोह से दूर रहने में ही भलाई है!

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