बचपन के दिन

 

“बचपन के दिन ”
याद आए आज फिर वही
मेरे बचपन के दिन,
खेल गली-मोहल्ले के वो लुकाछिपी
और वो कटी पतंग।
स्कूल जाने से बचने के बहाने,
और वो झूठा पेट का दर्द ।
याद आए आज फिर वही
मेरे बचपन के दिन,
चोट लगती जब भी खेल मे,
रोते जोर जोर देख माँ का मुख
रोना सच्ची का था या झूठ-मुच,
देख के बापू की वो गुस्से वाली आखं।
कहां गया अब वो बचपन
वो लुकाछिपी और वो कटी पतंग
वो कागज की कसतीया,
वो भागना स्कूल से घर।
सुना हो गया है सिरसवाल… फिर वो घर आंगन।
याद आए आज फिर वही
मेरे बचपन के दिन,
जब नाचते थे बारिश मे पहन के सिर पे लिफाफे,
और जब बनाते थे मिट्टीयों के घर।
याद आए आज फिर वही
मेरे बचपन के दिन।

-प्रियंका सिरसवाल

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