न जाने क्यों।।

जब भी वो खुली आंखों से सपने देखना चाहती है,
न जाने क्यों
उसकी उम्मीदें अंधेरी जंजीरों में जकड दी जाती है।

जब भी वो आसमान में उड़ना चाहती है,
ना जाने क्यों
उसके पैरों में हर तलक बेड़ियां ही पाई जाती है।

जब भी वो एक कदम आगे बढ़ना चाहती है,
न जाने क्यों
वो दस कदम पीछे खींच ली जाती है।

जब भी वो सच्चाई सबको दिखाना चाहती है,
ना जाने क्यों
वो उन झूट की दीवारों के पीछे छिपा दी जाती है।

वो दुनियां के तौर तरीके नहीं समझती,
बस इतना ही बतलाना चाहती है
पर ना जाने क्यों
हर दफा उसके मुंह पे
समाज के नाम की पट्टी बांध दी जाती है।

जब भी वो खुली आंखों से सपने देखना चाहती है,
न जाने क्यों
उसकी उम्मीदें अंधेरी जंजीरों में जकड दी जाती है।

जब भी वो आसमान में उड़ना चाहती है,
ना जाने क्यों
उसके पैरों में हर तलक बेड़ियां ही पाई जाती है।

जब भी वो एक कदम आगे बढ़ना चाहती है,
न जाने क्यों
वो दस कदम पीछे खींच ली जाती है।

जब भी वो सच्चाई सबको दिखाना चाहती है,
ना जाने क्यों
वो उन झूट की दीवारों के पीछे छिपा दी जाती है।

वो दुनियां के तौर तरीके नहीं समझती,
बस इतना ही बतलाना चाहती है
पर ना जाने क्यों
हर दफा उसके मुंह पे
समाज के नाम की पट्टी बांध दी जाती है।

_निकिता लाहोटी

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