जोकर

ना मैं बेगम हूँ
ना मैं गुलाम हूँ
ना मैं बादशाह हूँ
ना ही मैं तुरुप का इक्का हूँ
ताश की गड्डी में तो हूँ
पर ना ही मैं किसी का हिस्सा हूँ
मैं किसी रंग का नही
मैं किसी खेल में नही
कहने को तो अपनी कोई पहचान नही
बावन पत्तो में मेरा कोई अस्तित्व नही

जोकर,
ताश की गड्डी का जोकर
जिस खेल का हिस्सा हो जाऊं तो खेल बदल दूँ
बादशाह क्या इक्के की भी बाजी पलट दूँ
ताश के यही वसूल भी हैं
जोकर जिसका बाजी उसकी
बुलबुला सा हूँ मैं, एक पल ही जीता हूँ
दरिया में सबसे ऊपर हो कर रहता हूँ
अपनी पहचान हैं
अपना ही नाम हैं
किसी रंग का नही फिर भी
ताश की गड्डी में रहकर करना अपना काम हैं ।
©Manthan Prateek

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