ख़्याल सी ख़्वाहिशें”

जब कुछ समझ नहीं आता तो अक्सर अपने कमरे की दीवारों को ताकते रहती हूँ, जैसे ये मुझे समझना चाहती हैं और कुछ कहना भी,ठीक वैसे ही जैसे तुम समझते हो मुझे, मेरी खामोशियों को, मेरे चेहरे को पढ़ने की तमाम कोशिशे कर देते हो, मेरे दु:ख की वजह जानने के लिए हठ करते हो और मैं जब बिना रूके तुम से एक सांस में अपना हाल कह देती हूँ, असंख्य सु:ख-दु:ख भरी बातें सब कुछ तुमसे कह देती हूँ, मन हल्का सा लगने लगता है, पर इन्हें मैं कुछ न कहना चाहती हूँ , इन चार दिवारों में बंधन सा महसूस करती हूँ, एक घुटन सी जो शायद सबकी समझ से परे है,कभी-कभी मन करता है मैं तुम्हारे साथ होने का एहसास साथ लिऐ चिड़िया बन मैं ये बंदिशें तोड़ कर उड़ जाऊँ बहुत दूर तक,और फिर कभी न लौटूँ। 🕊️💕

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