एक तुम्हारे कहने भर से

इक छोटी सी बात को लेके, तुम जो इतना रूठी हो,
एक तुम्हारे कहने भर से, तुमसे क्यूँ मैं तोड़ दूं नाता।
क्या इतना ही कच्चा है ये, हम दोनों के प्रेम का धागा,
एक तुम्हारे कहने भर से, तुमसे क्यूँ मैं तोड़ दूं नाता।

गर मम्मी की बात मैं मानूं , तो मुझपर लगते इल्ज़ाम,
तेरी मानूं तो कहलाऊँ, मैया मैं जोरू का गुलाम,
गर जो बहनों की सुन ली तो, तुमको नजरंदाज कर दिया,
तुम ही बोलो कभी क्या मैंने, गाली दी या हाथ जड़ दिया,
इन सब में मैं फंस गया हूँ ,कोई नहीं जो समझ भी पाता,
एक तुम्हारे कहने भर से, तुमसे क्यूँ मैं तोड़ दूं नाता।

बोलो क्या मैं तेरे कहने, से घर की बात ना की,
बोलो क्या मैं सोना लेने, के लिए संवाद ना की,
होगी दिक्कत जानता था फिर भी मैंने तुम्हें न रोका,
काम करने की थी इच्छा, तब भी मैंने तुम्हें न टोका,
मेरी इच्छा है कि मैं भी, तेरे संग मिल घर सजाता,
एक तुम्हारे कहने भर से, तुमसे क्यूँ मैं तोड़ दूं नाता।

मानता हूँ कि मैं अब तक, कुछ तुम्हें दे भी न पाया,
पर न ये कहना कभी कि, तुमको मैंने बहुत सताया,
कल कहीं जब बच्चा अपना, नाम पिता का पूछ लेगा,
अपने वो हालात के खातिर, कोसने तुमको लगेगा,
पूछेगा क्यूँ छीना तुमने, मेरे सिर से पिता का छाता,
एक तुम्हारे कहने भर से, तुमसे क्यूँ मैं तोड़ दूं नाता।

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