अनसुलझी पहेली

वो कौन है

जो मेरे दर्द में साथ है

जो न होकर भी पास है

जो हसीं रात बन कर आती है

और सुबह चहक कर मुझे उठाती है

वो जो चाय की तरह कड़क है

और जिसकी आवाज़ नरम है

वो जो ओस की बूंदों सी बरसती है

जो बारिश में सौंधी सी महकती है

जो सुहानी रातों में बसती है

जो भोर की लाली की तरह चमकती है

जिसके आने से मुस्कान मेरी आती है

और मुस्कान तो बस मेरे राज़ छिपाती है

वो जो न होकर भी मुझमे रहती है

मुझे हँसाकर खुद रो लेती है

कभी मुलाक़ात तो हुई नही

कि पहचान सकूँ उसको

पर वो जो भी है

वो मेरी अनसुलझी पहेली है

अवि

 

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