अधूरी कहानी

 

रेहान और नायरा, आज सुबह से ही एक दूसरे से बिल्कुल भी बात नहीं किये थे। आज तो कुछ भी खाना-पीना भी नहीं हुआ था। रेहान अपना बेग पैक कर रहा था, दोनों चुप होने के बाद भी थोड़ी ही सही मदद कर रहे थे। दोपहर होने को आयी थी, पर बोले नहीं थे अब तक कुछ भी।

समय : 01:00अपरान्ह

रेहान : जा रहा हूँ मैं(बेग उठाकर जाने लगा)
नायरा : (अभी भी चुपचाप थी)
रेहान : जा रहा हूँ मैं(थोड़ा जोर से)
नायरा : रुको! तुम्हे रेलवे-स्टेशन छोड़ दूंगी।

[इतना कहकर नायरा नें चुपचाप गाड़ी की चाबी उठायी, चुपचाप ही गाड़ी तक आ गयी। रेहान भी गाड़़ी में बेठ गया। लगभग 25 मिनट के सफर में शोर से परेशान रहने वाली गाड़ी को भी आज ये चुप्पी सहन नहीं हो रही थी। सड़क पर चलने वाले वाहनों की आवाजें, इस चुप्पी को तोड़ने का निरर्थक प्रयास कर रही थी। खैर, वो रेलवे स्टेशन पहुँच चुके थे।]

समय : 01:45 अपरान्ह

[अजयनगर से विराटनगर जाने वाली ट्रेन का समय 02:00अपरान्ह का था, स्टेशन पर यात्री काफी कम नजर आ रहे थे। रेहान और नायरा चुपचाप एक बैंच पर बैठे थे। दोनों अपनी पुरानी यादों में खोये हुये थे। एक दूसरे से बोलना चाह रहे थे, कि रुक जाओ,अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। पर फिर भी दोनों कुछ भी नहीं बोल रहे थे। पुराने दिनों की यादों में खोये हुये दोनो इंसानों की तंद्रा, ट्रेन के हॉर्न से टूटी। ट्रेन आ चुकी थी। नायरा ये देखकर काफी डर गयी थी। अपनी जगह से हिल भी न सकी, रेहान ट्रेन में बैठने के लिए उठ खड़ा हुआ, पर नायरा अपनें आप में खोयी हुयी थी। नायरा को होश ही नहीं था। रेहान नें दो बार कहा भी जाने को, लेकिन वो तो जैसे शून्य हो गयी थी। रेहान अपनी उदासी लिये ट्रेन में जाकर बैठ गया, लेकिन नायरा अभी भी उसी मुद्रा में बिना हिले-डुले बैठी रही।
ट्रेन नें जाने के लिए हॉर्न लगाया, हॉर्न की आवाज को सुनकर जैसे उसकी चेतना लौटी, वह हड़बड़ाकर उठी, पास में देखा। रेहान वहाँ नहीं था, वह दोड़ती भागती सब बोगियों में खिड़की से देखने लगी। सुधबुध खो चुकी नायरा की नजरें रेहान को ढूंढ रही थी। ट्रेन नें धीमें धीमें रेंगना शुरु कर दिया था। नायरा जैसे अपना आपा ही खो बैठी थी। आखिर उसे रेहान एक खिड़की पर अपनें में गुम दिखायी पड़ा। वो बदहवास सी भागती हुई वहाँ पहुँची। नायरा ट्रेन के साथ दोड़ रही थी, रेहान की खिड़की के पास पहुँच कर एक ही बात बोली,”रेहान! मत जाओ ना।” ये कहकर अपने हाथ में पकड़ा हुआ लिफाफा अंदर डाल दिया। ट्रेन अपनी रफ्तार पकड़ चुकी थी। रेहान खिड़की में से देखता रहा। नायरा वहीं प्लेटफार्म पर नीचे ही घुटनों के बल बैठ गयी थी। उसकी आँखों से रुलाई फूट पड़ी थी। आँसूओं का सैलाब जो अब तक वो अपनी पलकों में कैद किये किये हुये थी, बह निकला था। वह फूट फूट कर रोने लगी। ट्रेन बहुत दूर जा चुकी थी। नायरा बुरी तरह टूट चुकी थी। जानती थी कि अब दुबारा कभी एक नहीं हो सकेंगे। वो खुद को ही कोसती जा रही थी। आँसुओं का सैलाब थमने का नाम नहीं ले रहा था। धुमिल हो चुकी उम्मीदों के साथ वो रोते हुये ही उठी और वापस घर जानें लगी।]

[इधर रेहान अपनी ही यादों में खोया हुआ खिड़की से बाहर प्राकृतिक नजारों को निहारे जा रहा था, लेकिन हर बार खूबसूरत लगने वाले ये नजारे आज उसे इतने खूबसूरत नहीं लग रहे थे, वो भी इनकी तरफ शून्य भर की तरह ताकता रहा। मन उसका भी नहीं लग रहा था। लगभग आधे घंटे बाद उसका ध्यान लिफाफे की ओर गया। उसने बड़े भारी मन से वो लिफाफा खोला, उसमें एक की-रिंग, एक छोटा सा चाकू, कुछ बटन, एक लॉकेट और एक पेन के साथ एक लेटर भी था।]

रेहान नें लेटर को खोलकर पढ़ना चालू किया-

प्रिय रेहान!
हम जानते थे कि ये दिन भी हमारी जिंदगी में आना ही था, अनजानी सी दुरियाँ हम दोनों ने ही तो जानबूझकर पैदा की थी। याद है, हम पहली बार एक ट्रेन के सफर में मिले थे। तुम्हारा खाने का डब्बा तुमसे खुल नहीं पा रहा था, और वो तुम्हारे हाथ से छिटककर नीचे गिर गया था। सारा खाना खराब हो गया था। तुमने अगले स्टेशन से कुछ लिया भी था, पर तुम्हारी आदत नहीं थी बाहर का कुछ भी खाने की, इसलिए तुम वो भी रखकर बैठे हुये थे। मैं तुम्हे देखकर समझ गयी थी। हमेशा खुद में खोये रहनी वाली मैं, तुम्हे देखकर न जानें क्यों मेरा मन पिघल गया, और मैनें बात करने के लिये पहल की। तुम्हे अपना खाना दिया, जिसमें दही और कुछ परांठे थे और जो स्टेशन से लिया था तुमनें वो मैनें खाया। तुमने खाने की तारीफ भी की,”वाह! एकदम झक्कास परांठे थे।” हालांकि ये तारीफ थोड़ी अजीब थी। समझ गयी थी मैं कि तुम्हें तारीफ करना नहीं आता। लेकिन बातों ही बातों में हमें पता चल गया था कि हमारा कॉलेज एक ही है। तब से हमारी पहचान शुरु हुई थी। मैनें हैदराबाद में रूम ले लिया था, लेकिन तुम्हारा तो हॉस्टल था। लेकिन 4 दिन बाद ही तुमने रैगिंग से परेशान होकर हॉस्टल छोड़ दिया। तुमने रूम भी लिया उसी मकान में, जहाँ मैं रहा करती थी। तुम रोज बाहर जाते, खाना खाने को लेकिन आते तब तुम्हारे चेहरे पर शिकन महसूस होती थी। मैं समझ रही थी,कि तुम बाहर का खाना नहीं खा सकते थे। इसलिए मैं भी अब रोज से थोड़ा अधिक खाना बनाने लगी थी। हालांकि ज्यादा नहीं होता था, लेकिन बाहर का खाकर आनें के बाद तुम्हे थोड़ा तो सुकून मिलता ही था। तुम जब खाना खाते थे, तब तुम्हारे चेहरे पर एकदम मासूस बच्चों की तरह मुस्कान नजर आती थी। इतनी मासूमियत में मुझे सच्चाई दिखती थी। अब ये रोज का हो गया था, मैं तुम्हे भी खाना बनाना सिखा रही थी, और तुम भी पूरे मन से सीख रहे थे। पर पता भी नहीं चला कि इन सबके बीच में प्यार कब हो गया। इसका एहसास तो मुझे तब हुआ, जब किसी बदमाश नें मुझे छेड़ने की कोशिश की और तुमने उसे ही पीट दिया, चोट तुम्हे भी बहुत लगी थी। लेकिन मैं पता नहीं क्यों, खुद में खुश हुये जा रही थी। धीरे धीरे अनकहा सा प्यार परवान चढ़ने लगा था। मैनें ही तो अपने प्यार का इजहार कर दिया था, लेकिन तुमने कुछ नहीं कहा था। बस प्यारी सी मुस्कान बिखेर दी। मैनें इसी को तुम्हारी हाँ समझ लिया था। थोड़े दिन बाद हम लिव-इन में रहने लगे थे। लेकिन तुम वही शांत स्वभाव से खुद में ही खोये रहे। समय गुजरता रहा, लेकिन अब तुम्हारे व्यवहार में परिवर्तन था या मैं ही कुछ ज्यादा आशायें लगा बैठी थी, लेकिन अब रोज कुछ न कुछ बहस होती ही रहती थी। समझ नहीं आ रहा था कि क्या करुँ, पर फिर भी अपनी पूरी कोशिश कर रही थी कि तुम्हे खुश रख सकूं, लेकिन सबकुछ सही से नहीं चल रहा था, और अब तो तुम घर में रहकर भी बिल्कुल भी बात वहीं करते थे। मैनें नयी कार ली, उस पर भी तुमनें मुझे उतनी खुशी से बधाई नहीं दी। उस दिन भी मैं तुम्हे खुशी से गले लगाना चाहती थी, लेकिन तुम खुद में खोये से रहते, मैं वो हर चीज करने की कोशिश करती जिससे तुम्हे खुशी मिले, लेकिन मुझसे नहीं हो पा रहा था। परसों तो हद ही हो गयी जब तुम्हारा पसंदीदा खाना बनाने के बाद भी तुमने उसकी तरफ देखा भी नहीं। मैं बात भी करने गयी तो तुम मुँह ढककर सो गये, मुझे मालूम था कि देश में वित्तीय संकट के कारण तुम्हारी नौकरी चली गयी थी, लेकिन तुम मुझे कुछ भी नहीं बता रहे थे। पहले शाम को 6 बजे घर आने वाले तुम, रात को 10 बजे तक आते थे। इस व्यवहार का कारण मुझे समझ आ रहा था। लेकिन कल शाम को जब तुमने कहा कि तुम वापस अपने घर जा रहे हो, मैं तो होश ही खो बैठी थी, लेकिन जानती थी कि पिछले दिनों में जो कुछ हो रहा था, एक ना एक दिन ये बात सामने आनी ही थी। बस तुम तब से ही चुप हो, और आज भी चुप ही हो। जानती हूँ, कि हमेशा के लिये जा रहे हो, तुम्हे रोकना चाहती हूँ, पर रोक नहीं सकती।
काश! तुम ही एक बार मुझसे पूछ लेते, लेकिन तुम तो कुछ बताते भी नहीं हो।
कहना चाहती थी मैं, कि मुझे भी साथ ले चलो। पर कुछ कह भी ना सकती
मालूम है, जब तक तुम इसे पढ़ोगे, बहुत दूर जा चुके होगे। लेकिन अब वापस लौटकर मत आना, क्योंकि अब लौटकर वापस गये तो मैं बिल्कुल नहीं जी सकूंगी।
अभी इतनी ज्यादा बिखरी नहीं हूँ मैं,समेट लूंगी खुद को खुद में, अपने-आप में रहना सीख लूंगी लेकिन अब यदि तुम वापस लौटकर आये और फिर चले गये तो टूटकर बिखर जाऊंगी मैं, समेट नहीं सकूंगी खुद को तब।
इसलिए अब तुमसे यही गुजारिश है, कि अब लौटकर कभी वापस मत आना। मैं अगर कोशिश भी करुँ तुमसे मिलने कि कभी तो बता देना कि रेहान नही है यहाँ, मैं तो कोई ओर हूँ।
रेहान! जानती हूँ याद बहुत आयेगी, लेकिन वापस लौटकर मत आना, कहीं मिल भी जाऊँ गलती से, तो पहचानने से इनकार कर देना। इससे ज्यादा अब टूटना नहीं है मुझे।
प्लीज रेहान! अब वापस मत आना।

नायरा!

 

पत्र पढ़कर रेहान की आँखों से भी झरना बह निकला। ट्रेन अपनी गति से दौड़ रही थी। यादें पीछे छूटती जा रही थी।

 

© Krishan Kant Sen

Spread the love