अंश

कहते हैं इज्ज़त ही औरत का गहना है..
वो छिन जाए तो उसका मान नहीं..
देखे दुनिया उसको उन नज़रों से, जैसे वो बिलकुल पाक नही..

भूल गया तू वो कर्ज़, वो जीवन वरदान कहीं..
उसी कोख का अंश है, अरे इंसान है तू भगवान नहीं..

तड़प क्या होती है ये उससे पूछो,
इजाज़त बगैर छुए गए अंग जिसके..
अपने ही जिस्म में खुद को कैद करना क्या है, जाओ ज़रा ये समझो उससे..

बेकसूर है वो पर बेगुनाह पर इल्ज़ाम कई..
तू देख पाए या नही, जंग लड़ती है वो हर रोज़ नयी..

वो भूखी नहीं तेरी ईज्ज़त की, उसको खुद पर है अभिमान वही..
तू बदल के देख नज़रिया अपना, शायद तेरी नीयत उतनी भी साफ नहीं..

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